अर्थात् अपने मन को मुझमें लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी उपासना करो और मुझे प्रणाम करो। ऐसा करने पर तुम निश्चय ही मुझे प्राप्त हो जाओगे।
श्री कृष्ण संदेश यात्रा का प्रथम उद्देश्य समाज को भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति से जोड़ना है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने स्पष्ट कहा है कि सच्ची भक्ति केवल बाह्य अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, अपितु पूर्ण समर्पण, निष्काम भाव, श्रद्धा और प्रेम का नाम है।
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥" (गीता 9.22)
सच्ची कृष्णभक्ति वह है जिसमें भक्त अपने अहंकार, स्वार्थ और आसक्ति का त्याग कर स्वयं को श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर देता है। इस यात्रा के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति, नामस्मरण, कीर्तन, सत्संग एवं गीता-अध्ययन के द्वारा कृष्ण चेतना से जोड़ा जाएगा।
भगवान श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण जीवन धर्म, करुणा, न्याय, मर्यादा, नेतृत्व और लोककल्याण का अनुपम आदर्श है।
बाल्यकाल में उन्होंने असंख्य असुरों का संहार कर धर्म की रक्षा की। महाभारत में उन्होंने यह सिद्ध किया कि धर्म की विजय के लिए संख्या नहीं, सत्य और संकल्प आवश्यक होते हैं।
"यतो धर्मस्ततो कृष्णः।
यतः कृष्णस्ततो जयः॥"
भगवान श्रीकृष्ण ने समाज को सिखाया कि शक्ति का उपयोग संरक्षण के लिए होना चाहिए, शोषण के लिए नहीं।
विशेष रूप से श्रीकृष्ण द्वारा 16,100 बंधनमुक्त स्त्रियों को सामाजिक सम्मान प्रदान करना नारी गरिमा और संरक्षण का महान उदाहरण है। उन्होंने यह संदेश दिया कि समाज का धर्म है कि वह उपेक्षित, पीड़ित और असहाय जनों को सम्मानपूर्वक स्वीकार करे।
आयोजित किए जाएँगे।
भगवान श्रीकृष्ण को कैसे प्राप्त किया जाए, यह प्रश्न प्रत्येक साधक के मन में उत्पन्न होता है। शास्त्र बताते हैं कि भक्ति, साधना और सत्संग के माध्यम से ही भगवान का सान्निध्य प्राप्त होता है।
"भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।" (गीता 18.55)
यात्रा के दौरान भक्तों को निम्न साधनाओं का अभ्यास कराया जाएगा:
मानव जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य आत्मा के वास्तविक स्वरूप का अनुभव करना है।
"न जायते म्रियते वा कदाचित्।" (गीता 2.20)
श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप हमें यह बोध कराता है कि समस्त सृष्टि उसी परम चेतना की अभिव्यक्ति है। जब मनुष्य आत्मज्ञान प्राप्त करता है, तब उसका जीवन भय, मोह एवं अज्ञान से मुक्त होने लगता है।
यह यात्रा आत्मचिंतन, ध्यान और साधना के माध्यम से आत्मिक उन्नति का अवसर प्रदान करेगी।
भारतीय संस्कृति का मूल आधार आध्यात्मिकता है। संस्कृति तभी जीवित रहती है जब उसके पीछे ज्ञान, साधना और मूल्य उपस्थित हों।
जिस दिव्य ज्ञान को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को प्रदान किया, वही ज्ञान आज भी मानवता का मार्गदर्शन करता है।
"तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।" (गीता 4.34)
यात्रा के माध्यम से लोगों को भारतीय संस्कृति, वेद, उपनिषद्, गीता एवं सनातन जीवन-दर्शन से परिचित कराया जाएगा।
जब व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से जागृत होता है, तब वह समाज और संस्कृति के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
यात्रा में आगंतुकों को यह समझाया जाएगा कि किस प्रकार आध्यात्मिक ऊर्जा, नैतिक जीवन और सामाजिक उत्तरदायित्व के माध्यम से सांस्कृतिक समृद्धि को बढ़ावा दिया जा सकता है।
सनातन धर्म में सेवा को भगवान की उपासना माना गया है।
"नर सेवा ही नारायण सेवा है।"
सेवा केवल दान नहीं, अपितु मानवता के प्रति करुणा की अभिव्यक्ति है।
यात्रा के अंतर्गत:
आयोजित किए जाएँगे।
भगवान श्रीकृष्ण के संदेशों को आधुनिक एवं प्रभावी माध्यमों द्वारा जन-जन तक पहुँचाना इस मिशन का प्रमुख लक्ष्य है।
"विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥" (गीता 5.18)
गीता, भागवत, महाभारत एवं कृष्ण कथाओं के माध्यम से समाज में आध्यात्मिक शिक्षा का प्रसार किया जाएगा।
आज का युवा यदि श्रीकृष्ण के आदर्शों से प्रेरित हो जाए तो वह स्वयं, समाज और राष्ट्र का भविष्य बदल सकता है।
"उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।" (गीता 6.5)
यात्रा का उद्देश्य युवाओं को:
नशामुक्त जीवन
चरित्र निर्माण
नेतृत्व क्षमता
राष्ट्र सेवा
आध्यात्मिक जागरूकता
सांस्कृतिक गौरव
की दिशा में प्रेरित करना है।
हमारा उद्देश्य केवल यात्रा निकालना नहीं, बल्कि कृष्ण चेतना का जागरण, सनातन संस्कृति का संरक्षण, युवा शक्ति का मार्गदर्शन, समाज सेवा का विस्तार तथा धर्ममय राष्ट्र निर्माण है।